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दिलबर के हुस्न-ओ-जमाल का दीदार चाहता है।

Shailendra Bhatnagar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बीमार सा दिल मेरा हयात-ए-मुख़्तसर चाहता है,
        
                                                    
                            
अपने इलाज के लिए  तुझ सा चारागर चाहता है।

एक अरसे से  तालिब-ए-दीदार है दिल-ए-बीमार,
बराए-दवा  बस एक नज़र  तेरा दीदार चाहता है।

ज़माने की  दिल-आज़ारी से आजिज़  दिल मेरा,
अब और कुछ नहीं तुझ सा ग़म-गुसार चाहता है।

ख़याली  मोहब्बत का आधा-अधूरा सा  फ़साना,
मुक़म्मल करने को तुझ सा हम-सफ़र चाहता है।

हर रोज़ सुबह आँख खुलते ही दिल के आईने में,
दिलबर के हुस्न-ओ-जमाल का दीदार चाहता है।
- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
एक घंटा पहले
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