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दिलबर के हुस्न-ओ-जमाल का दीदार चाहता है।

                
                                                         
                            बीमार सा दिल मेरा हयात-ए-मुख़्तसर चाहता है,
                                                                 
                            
अपने इलाज के लिए  तुझ सा चारागर चाहता है।

एक अरसे से  तालिब-ए-दीदार है दिल-ए-बीमार,
बराए-दवा  बस एक नज़र  तेरा दीदार चाहता है।

ज़माने की  दिल-आज़ारी से आजिज़  दिल मेरा,
अब और कुछ नहीं तुझ सा ग़म-गुसार चाहता है।

ख़याली  मोहब्बत का आधा-अधूरा सा  फ़साना,
मुक़म्मल करने को तुझ सा हम-सफ़र चाहता है।

हर रोज़ सुबह आँख खुलते ही दिल के आईने में,
दिलबर के हुस्न-ओ-जमाल का दीदार चाहता है।
- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
39 मिनट पहले

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