मेरा दिल दे रहा है वफ़ा की दुहाई
मुहब्बत में हमने तो ठोकर ही खाई
निकला मुहब्बत के सफ़र को मैं घर से
तेरी मासूम सी तस्वीर नजरों में आई
गुजरा था जब मैं तेरे शहर से
तेरी मुहब्बत की खुशबू सी आई
हूं परेशां मैं उस सहर से
जब तुझसे मैने थी नजरें मिलाई
रहता था खुश मैं जो इस क़दर से
मुहब्बत निभाने की कसमें थी खाईं
फिर निकली थी शाखें ज़माना ए हिज्र से
जिस रोज दामन थाम गैरों का हुई तू पराई
डरता हूं मैं अब इस ज़िक्र से
मजबूरी थी तेरी या थी बेवफ़ाई
अब हुआ ज़माना इस बातों को शाहिद
ना जाने क्यों फिर आज उनकी याद आई
-अश्क़ फ़तेहपुरी