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परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम।

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चारों तरफ़ कोहराम मचा है
        
                                                    
                            
बुद्ध के देश में,
यहाँ रावण घूम रहा है राम के भेष में।
देखो यारों सेंध लगी है
जनता के जनादेश में,
जनता त्राहिमाम कर रही
पूरे देश में।

हे माधव ! पुकार रहा है कलियुग का महाभारत,
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानि र्भवति भारत।
हे मधुसूदन आ जाओ कि प्रतीक्षारत है पार्थ
उद्धार करो मानवता का निःसंदेह निस्वार्थ।

द्रौपदी के चीरहरण की देखो फिर तैयारी है,
दुःशासन का दुस्साहस सभा पे भारी है;
अबला की मर्यादा रौंदे एक शिकारी है।

तुमको गिरधर ताक रही है यहाँ और वहाँ भाग रही है,
हिरणी जैसी कातर नजरें
दया की भिक्षा मांग रही हैं।

भीष्म, द्रोण, कृपाचारी, युयुत्सु, विदुर
भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव से बहादुर।
दुर्योधन और करण दानवीर,
विकर्ण ही था इक सभा में शूरवीर;
जो था व्याकुल और अधीर।
समस्त हस्तिनापुर प्रदेश में।

चारों तरफ़ अधर्म मचा है,
धर्मराज के देश में।

एकमात्र जीवित थी आशा,
पलटेगा अभी समय का पासा।
हट जाएगी घोर निराशा;

कृष्ण सखा अभी आयेंगे
दंड यहाँ सब पाएंगे, पापी सारे कहाँ जायेंगे।
सब दुष्ट मारे जाएंगे,
होगा सबका काम तमाम;
परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम।

राधा देखो नाच रही कृष्ण प्रेम आवेश में।
यहाँ पे रावण घूम रहा है राम के भेष में;
जनता त्राहिमाम कर रही पूरे देश में।
-अश्क़ फतेहपुरी 
एक महीने पहले
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