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अद्वितीय विषमता

shafaque rauf

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस चराचर विश्व में, बस एक मानव ही पृथक है,
        
                                                    
                            
पशु-विहंगम में कहाँ, यह रूप जो इतना गज़ब है।
वेशभूषा, सभ्यता, संस्कृति के ढेरों आवरण हैं,
जाति, मजहब, गोत्र, नक्षत्रों के अनगिनत व्याकरण हैं।

एक ही सुर, एक बोली में न बँधती बात इसकी,
आस्था, व्यवस्था, करम से भिन्न है हर ज़ात इसकी।
मापदंडों की तराज़ू पर सभी का भार भिन्न है,
व्यवहार बाहर से मिले तो भी हृदय के तार भिन्न है।

रक्त की इस चेतना में, रसायनों की भिन्नता है,
एक ही सांचे में ढलकर भी, अनूठी भिन्नता है।
एक ही दीवार के भीतर, जो युग-युग से खड़े हैं,
एक घर में रहकर भी, वे फासलों में बँट रहे हैं।

यह शीतयुद्ध है मौन सा, जो 'मैं' की खातिर चल रहा,
अहं का यह तीव्र मरुथल, भीतर ही भीतर जल रहा।
पर सत्य तो यह है कि 'मैं' का वजूद ही कोई नहीं,
इस विराट ब्रह्मांड में, उसकी हक़ीक़त कुछ नहीं।
-शफ़क़ रऊफ
16 घंटे पहले
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