खंडहर पड़े उस पुराने घर को,
टूटी हुई खिड़कियों और दरवाज़ों को देखकर
अक्सर सोचती हूँ...
किस ज़माने में
यह घर भी चहकता होगा,
हर कोना महकता होगा।
हँसी की गूँज से
दीवारें मुस्कुराती होंगी,
अपनों का साथ होगा,
हर पल कोई पास होगा।
रातों का भी अपना पहरा होगा,
सुबह का सूरज भी
आँगन में सुनहरा उतरता होगा।
आज वही घर
खंडहर बनकर खड़ा है,
और उसके अपने...
अपने-अपने घरों में बस गए हैं।