अजीब सा रिश्ता था उसका…
कभी मेरी ख़ामोशी भी पढ़ लेता था,
कभी मेरी बातों का मतलब भी नहीं समझता था।
कभी बिना कहे मेरा हाल पूछता,
कभी सामने होकर भी
मुझे अनजान-सा कर देता था।
कभी मेरी हँसी की वजह बनता,
कभी उसी हँसी के पीछे
छुपा दर्द दे जाता था।
उसकी मोहब्बत भी अजीब थी…
वो मुझे खोना नहीं चाहता था,
मगर मुझे अपना कहने से
हर बार डर जाता था।
मैंने भी उसकी इस उलझन को
मोहब्बत समझकर निभाया,
और वो हर बार
थोड़ा पास आकर
थोड़ा और दूर चला गया।
शायद उसे भी मोहब्बत थी…
बस मेरी तरह
उसे निभाने का हुनर नहीं था।