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कविता (मां)

Savitri Swami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धीरे-धीरे डांटा मुझको,
        
                                                    
                            
कभी मुझे फटकारा है।
जब-जब बहे आंखों से आंसू,
मां तूने मुझे बुचकारा है।।
मेरे जन्म की प्रश्व पीड़ा ने,
कितना तुझे रुलाया मां।
फिर भी पकड़कर अंगुली तूने,
चलना मुझे सिखाया मां ।।
करके बड़ा मां तूने मुझको,
क्या पा लिया छुटकारा है।
जब जब बहे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मां तूने मुझे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
करवाकर अपना स्तनपान,
मां तूने मुझको पाला था।
जब जब गिरा मैं धरा पे,
मां तूने मुझे संभाला था।।
मोल करे क्या तेरी ममता का,
मां अथाह ये सागर सारा है।
जब जब बहे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मां तूने मुझे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
मैं क्या जानू मेरी कमियां,
मां तुझको हर पल खलती है।
कभी सुधारे तु धीरे से,
कभी तू आग उगलती।।
उस आग की शीतलता में,
मैने दिया हुंकारा है।
जब जब बहे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मां तूने मुझको,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
खाकर पीकर नहा धोकर मां,
जब था मैं स्कूल गया।
जैसे जैसे बड़ा हुआ मां,
तेरी ममता को क्यों भूल गया।।
तेरा प्रेम कभी कम ना होता,
मां बहती निर्मल धारा है।
जब जब बहे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मां तूने मुझे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
करके विवाह मां तूने मेरा,
मुझको बंधन में बांधा था।
खुश रहूं मैं अपनी गृहस्थी में,
यही तुम्हारा इरादा था।।
मोह माया से तंग होकर मां,
दिल ने फिर से तुझे पुकारा है।
जब जब बहे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
मां तूने मुझे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
 
2 महीने पहले
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