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पक्की फसल पे बरसा पानी

Savitri Swami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अमीरों को है सुख देती,
        
                                                    
                            
अन्नदाता को करती आघात।
पक्की फसल पे बरसा पानी,
बिन मौसम आई बरसात।।
बुवाई समय पे चलती आंधी,
पक्की फसल पे बूंदाबांदी,
करती है बहुत नुकसान।
सबका पेट पालने वाला,
रोता रह जाता किसान।।
अपने खेत उजड़ते देखे,
बचा नहीं कुछ उसके पास।
पक्की फसल पे बरसा पानी,
बिन मौसम आई बरसात।।
कभी सींचता नहर का पानी,
कभी फव्वारा विधि अपनाता है।
जब बरसे मौसम की बरखा,
किसान का मन हर्षाता है।।
कभी उजड़ते मोठ बाजरा,
कभी उजड़ती रुई कपास।
पक्की फसल पे बरसा पानी,
बिन मौसम आई बरसात।।
खाद देता, बीज बोता ,
खरपतवार है निकालता।
करके वो दिन रात मेहनत,
अपनी फसल को पालता ।।
अंत समय में धोखा होता,
मिली नहीं सरकारी सौगात।
पक्की फसल पे बरसा पानी,
बिन मौसम आई बरसात।।
कभी बाढ़ कभी सूखा पड़ता,
कभी पड़ता है त्रिअकाल।
महंगाई चढ़ शिखर पे बोले,
कौन पूछता गरीब का हाल।।
भटक रहा युवा का मन,
रोजगार नहीं लगता हाथ।
पक्की फसल पे बरसा पानी,
बिन मौसम आई बरसात।।
( सावित्री स्वामी )
13 घंटे पहले
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