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शिखर शेष है

Saurabh Panday

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मत कहो कि राह कठिन है,
        
                                                    
                            
कह दो—मेरा प्रण शेष है।
हर पराजय की राख तले,
एक नया उद्भव शेष है।

आँधियाँ दीपक बुझा सकें,
इतना उनका बल कब था?
जिसके भीतर ज्वाला जागे,
उसका कौन विकल कर सका?

जो गिरकर फिर उठ जाता है,
वही समय का नरेश है।
जो स्वयं से युद्ध जीत ले,
उसका हर संघर्ष विशेष है।

मत रुक, मत झुक, मत थक पथिक,
तेरा हर प्रयास निवेश है।
शिखर अभी भी तुझे पुकारे—
चल... अभी शिखर शेष है।
:- सौरभ पाण्डेय
3 महीने पहले
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