खुद सूरज की तपिश सहता हूँ,
और सबको शीतल छाँव देता हूँ।
लोग धूप की शिद्दत से तपकर मेरे पास
कुछ पल आराम करने आते हैं,
मैं अपनी छाँव से सुकून देता हूँ
और उनकी थकान मिटाता हूँ।
अपनी शाखाओं पर पवन को सहलाता हूँ,
अपनी साँसों से सबको प्राण देता हूँ।
पंछियों को अपनी डालियों पर घर देता हूँ,
और लोगों को फल देकर उनकी भूख मिटाता हूँ।
निस्वार्थ भाव से प्रकृति का रूप सजाता हूँ,
और अनगिनत जीवों का पोषण करता हूँ।
दिनभर एक ही स्थान पर स्थिर रहकर,
इस अस्थिर जगत को संदेश देता हूँ—
स्वयं निस्वार्थ होकर
संसार को निस्वार्थ रहना सिखाता हूँ।
फिर भी यह स्वार्थी संसार
कभी मुझे काटता, कभी जलाता है।
पर मैं फिर भी शिकायत नहीं करता,
क्योंकि वृक्ष होने का अर्थ ही यही है—
खुद सहकर भी औरों को जीवन देना,
और मरने के बाद भी संसार के काम आना।