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रूबी रखती है किताबें जैसे

Satyendra Rubi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझ को ज़ेर-ए इताब रखता है
        
                                                    
                            
क्यूँ तअल्लुक़ ख़राब रखता है

हम पे जितने सितम हैं ढा लो तुम
रब तो सब का हिसाब रखता है

ख़ाक होना है एक दिन सब को
झूट में क्यूँ रुआब रखता है?

ख़ार जैसी ही उस की फ़ितरत है
प्यार से वो गुलाब रखता है

अपनों से वास्ता है जिस का भी
अपनी आँखों में आब रखता है

रूबी रखती है किताबें जैसे
इक शराबी शराब रखता है
-रूबी गुप्ता 
2 महीने पहले
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