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उनकी जिन्होंने समझा हमें बेचारी

SATYENDRA KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह मनमानी करता रहा
        
                                                    
                            
वह बेईमानी करता रहा
मैं नींद में नहीं थी
मैं सोई नहीं थी
लोक लाज के चलते मैं बोली नहीं
लोक लाज के चलते मैं मुंह खोली नहीं
वह मेरी मौन स्वीकृति समझता रहा
वह मेरे साथ गलत करता रहा
यही आज नारी का हाल है
जब नारी करती बवाल है
तब उसे समाज कहा कुलटा चरित्रहीन
जबकि पुरुष वर्ग था है रहेगा चरित्रहीन
अब हमें जगना है
बोलना है, विद्रोह करना है
अब नहीं हमें डरना है
अब हमें लड़ना है
अब हमें अड़ना है
जला दो बस्तियां सारी
उनकी जिन्होंने समझा हमें बेचारी।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
एक महीने पहले
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