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जहाँ आगे घुप अंधियारा था।

Satyendra dwivedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो राह काटने चली थी
        
                                                    
                            
अधूरी डगर पे छूट गई,
जाने क्या भांपा उसने
मानो अंदर से टूट गई।
ना पाँव थके थे राहों में,
ना पाँव में कोई छाला था,
बस क़दम वहीं पर रुक बैठे,
जहाँ आगे घुप अंधियारा था।
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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