जो दूर हैं उन्हें , ढूँढती हैं निगाहें,
जो पास हैं उनसे, हम मिलते नही है ।
जब रात का अंधेरा,
डराता है हमें,
दिन के उजाले,
याद आते हैं ।
फिर वजह क्या है,
किस डर से,
दिन में भी घर से
हम निकलते नहीं हैं ।।
फुर्सत के लम्हों मे,
करते हैं वादे,
मंज़िल तक हम
साथ चलेंगे ।
सफ़र मे मगर ,
हम सफ़र बनकर
दो कदम भी साथ,
हम चलते नहीं हैं ।।
सत्यपाल सिह
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