आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जो दूर हैं..

                
                                                         
                            जो दूर हैं उन्हें , ढूँढती हैं निगाहें,
                                                                 
                            
जो पास हैं उनसे, हम मिलते नही है ।

जब रात का अंधेरा,
डराता है हमें,
दिन के उजाले,
याद आते हैं ।
फिर वजह क्या है,
किस डर से,
दिन में भी घर से
हम निकलते नहीं हैं ।।

फुर्सत के लम्हों मे,
करते हैं वादे,
मंज़िल तक हम
साथ चलेंगे ।
सफ़र मे मगर ,
हम सफ़र बनकर
दो कदम भी साथ,
हम चलते नहीं हैं ।।

सत्यपाल सिह

हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर