सदियों से बजने वाला
होंठों पर सजने वाला ।
इस नए दौर के शोर में
हूँ भूला बिसरा गीत मैं ।।
मुझसे ज़माना नजर चुराए
या गवैया बनकर गाए ।
मुझे नहीं इससे सरोकार
पगला हूँ, है सब से प्यार ।
बन जाओ सखा तुम्हें सिखाऊं
प्रीत की सही रीत मैं ।।
रोज़ तुम्हें नए गीत मिलेंगे
नए सुर, नई धुन, संगीत मिलेंगे ।
बेशक उन्हें तुम अपना लोगे
पर क्या मुझे बुला दोगे ?
मुझे क्या मानो वो तुम जानो
सबको मानूँ अपना मीत मैं ।।
हूँ भूला बिसरा गीत मैं ।।
-सत्यपाल सिंह