हम अनजान रहे
और हमारे अपने
माना किए ग़ैर हमें ।
पीठ में खंजर भोंकते रहे
कोई दर्द दिए बगैर हमें ।
बेनक़ाब हुए तो फब्तियाॅ कसी
कह कहकर साहिब-ए-ख़ैर हमें ।
मीठी ज़बान की आड़ में बरसों
वे पिलाते रहे मीठा जहर हमें ।
हमारा ज़िक्र तक है अब नागवार उन्हें
जो रखते थे ख़यालों में आठों पहर हमें ।
-सत्यपाल सिंह