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हम अनजान रहे और

                
                                                         
                            हम अनजान रहे
                                                                 
                            
और हमारे अपने
माना किए ग़ैर हमें ।

पीठ में खंजर भोंकते रहे
कोई दर्द दिए बगैर हमें ।

बेनक़ाब हुए तो फब्तियाॅ कसी
कह कहकर साहिब-ए-ख़ैर हमें ।

मीठी ज़बान की आड़ में बरसों
वे पिलाते रहे मीठा जहर हमें ।

हमारा ज़िक्र तक है अब नागवार उन्हें
जो रखते थे ख़यालों में आठों पहर हमें ।
-सत्यपाल सिंह
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4 महीने पहले

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