इस सावन में,
मत अकेले आना तुम ।
प्रीतम को मेरे,
संग अपने लाना तुम ।।
शबनम मे नहाई पुरवाई
छूकर मेरे तप्त बदन को ।
और तपिश दे जाती है
विरह में तपते तन-मन को ।
मेरे व्यथित मन की दशा
ओ मेघ! उनको बताना तुम ।।
प्यासी धरती अम्बर में देखे
कब छाएं, गरजें, बरसें बादल ।
मैं तो बाट जोह रही उनकी
आएं तो, हो तन मन शीतल ।
बढ़ती जाए पल-पल व्याकुलता
ओ जलधर! उनको बताना तुम ।।