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बदरा रे !

                
                                                         
                            इस सावन में,
                                                                 
                            
मत अकेले आना तुम ।
प्रीतम को मेरे,
संग अपने लाना तुम ।।

शबनम मे नहाई पुरवाई
छूकर मेरे तप्त बदन को ।
और तपिश दे जाती है
विरह में तपते तन-मन को ।

मेरे व्यथित मन की दशा
ओ मेघ! उनको बताना तुम ।।

प्यासी धरती अम्बर में देखे
कब छाएं, गरजें, बरसें बादल ।
मैं तो बाट जोह रही उनकी
आएं तो, हो तन मन शीतल ।

बढ़ती जाए पल-पल व्याकुलता
ओ जलधर! उनको बताना तुम ।।
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4 वर्ष पहले

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