मिज़ाज-ए-हुनर जब किसी ने था पूछा,
तो हमने निगाहों का वहम कह के टाल दिया।
नई कुछ क़ताएं ख़यालों में आईं,
तो अपनी ही वाक़फ़ियत से एक ऐसा सवाल किया...
अभी हम कहाँ तेरे मानिंद हुए हैं,
न हमको तू अपने अभी दिल में जगह दे।
मासूमियत अपनी सूफ़ियाना होने चली है,
उसकी मोहब्बत के तसव्वुर को हमने दिल से निकाल दिया।