खुलकर हँसने के तंत होते हैं ये बहारों के दिन
चित्त के सिंगार के तार होते हैं ये बहारों के दिन
थमी नजर के मकरंदों के व्यंजनों के कहा
खुशबू आभार के होते हैं ये बहारों के दिन
मचलती हुई तितली उड़-उड़कर बैठे कहीं
बैठी हुई तितली पर नयन उच्छृंखल बिचरे
बिचरती हुई कहे ये श्रृंगार के हैं बहारों के दिन
मदमाती चली लगी हवा बोलने खुश्बू की कली
सार का हार पहना दो बयार ये बहारों के दिन
नूतनता की आँखें चार हुई जो यार से
कहा कानों में हँसकर इश्क ये बहारों के दिन।
✍🏿 सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)