असंग अकेला सूना सा जीवन
लड़ता भिड़ता चलता जीवन
जलापात सा झरता अश्रुपूरित नयन
सदा बहता है इसमें सावन
रहे न अकेला हृदय का आँगन
पड़ते ये उमड़-घुमड़ हरपल
सावन के मेघ से नित घिर आते
रुदन करते निहंग लाड़ते
मेरी हूकों की बगिया को
अनुषंग से तर कर जाते।
मेरे चषुओं की द्रवित धार
मेरे अपने जीवन का यह सिंगार
व्यथित नैन का डबडबाया प्यार
नंद-बला की उद्विग्न गुहार
कब किसने किया मुझसे प्यार
क्षुदि-प्रेण-रेण-उर-पुर सह्य द्वार
भव की ताड़ना वृजिन-अमार
वहन करता मै अद्वैत अपार।
जीवन का मेरे घड़ी हर घड़ी
नकारा तिरस्कृत सूक्ष्म गण
तनिक नेह जल की कण मंगल
पिपासित मेरे हृदय का कण-कण
सब जग सूना मैनें पाया
किसी ने न मुझको अपनाया
सुख से ही सुख है कहते हैं
भरा-पुरा सृष्टि-आश्रय छाया।
आह! पर है हिय तोषहीन
मोद-च्युत वृजिन में प्रलीन
आनंद कामना ऋतुराज आशा
चिराग-सा रहित वात्सल्य विहीन
उदास काल में जीवन की
तिरस्कार में अपनेपन की
बावला सा भटक रहा हूँ
खोकर अपने उजास का मेला।
मैं अपने उर में जिसको धारूँ
सर्वस्व निछावर करूँ जीवन हारूँ
सुगंध के गंधरस सम्मोहनी को
कोमल पुष्प सरूप मैं मनुहारूँ
वह कंटक जैसा मेरे उर छेद
मेरा मृदुल हृदय छाल-छाल
करे तिरस्कार वह भाल-भाल।
- सतीश शेखर श्रीवास्तव “परिमल”
सिंगरौली (मध्यप्रदेश)