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सूर्य का कोप और धरा की पुकार

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तप रही है धरा आज, अंगारों की बौछार है,
        
                                                    
                            
पूछ रही है सृष्टि सारी, कैसा यह अत्याचार है?

हे ग्रीष्म तुम इतने निष्ठुर, इतने निर्दयी क्यों हुए,
तेरी तपिश से जीव-जंतु, सब व्याकुल और मौन हुए।

मुरझा गए हैं पेड़-पौधे, पतियां सब सूखकर गिरीं,
हरी-भरी जो शाखायें थीं, आज बेबस और बेजान दिखीं।

छांव ढूंढती फिरती चिड़ियां, कंठ सबका सूखा है,
नदियों का पानी सूखा, हर जीव प्यासा-भूखा है।

पशु भटकते छांव को, पशुओं का धीरज डोला है,
लपटें चलतीं ऐसी जैसे, अंबर ने अंगारा खोला है।

खेतों की मिट्टी फटी पड़ी, जैसे धरती रोई हो,
शीतल पवन की सुध-बुध मानो, गहरी नींद में सोई हो।

इंसान भी बेहाल हुआ, झुलस रही है सबकी त्वचा,
सूरज की इस तेज अगन से, कोई न अब तक बच सका।

हे ऋतुराज के तीखे रूप अब तो थोड़ी दया करो,
बरसा कर अमृत की बूंदें, इस तपती धरती को शांत करो।

-: सार्थक पियुष सिंह
6 दिन पहले
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