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कागज़ के टुकड़े और खुशियाँ

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हाय धोन, क्या रुपयों से?
        
                                                    
                            
क्या पैसे वाले खुश हैं सबसे ?
आज दौड़ती इस दुनिया में,
लोग खो गए हैं पैसों में।

रुपयों के पीछे पागल मन,
भूल गया है सच्चा जीवन।
क्या सारी खुशियाँ बिकती हैं?
क्या नोटों से वे मिलती हैं?

मरने के बाद क्या जाएगा?
क्या कोई संपत्ति ले जाएगा?
खाली हाथ ही आए थे,
खाली हाथ ही जाएँगे।

फिर क्यों इतना अभिमान यहाँ?
क्यों भूल गए इंसान यहाँ?
छोड़ो यह अंधी दौड़ अभी,
पहचानो असली सुकून कभी।

छोटी-छोटी चीज़ों में,
खुशियाँ ढूंढो राहों में।
सुबह की वो ठंडी हवा,
जैसे मर्ज की हो दवा।

बच्चों की वो नादान हँसी,
खिलती है जहाँ सच्ची खुशी।
दोस्तों का वो साथ पुराना,
याद आता है बीता जमाना।

माँ के हाथों का वो खाना,
लगता है स्वर्ग का ठिकाना।
तारों भरा वो नीला गगन,
कर देता है शांत यह मन।

पैसों से आराम तो आएगा,
पर सच्चा प्यार न मिल पाएगा।
मन का संतोष ही असली धन,
इसी से महकेगा हर जीवन।

-: सार्थक पियुष सिंह
2 महीने पहले
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