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गरिमा की उड़ान

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पर्वत जैसी गरिमा लेकर जीना सीखें,
        
                                                    
                            
ऊँचा उठकर हर कड़वे घूँट को पीना सीखें।
धैर्य रहे जीवन में इतना, जैसे सदियों का सन्नाटा,
सुख-दुख के थपेड़ों को भी हँसकर सहना सीखें।

भीतर की ऊँचाई जब छू लेती है अम्बर,
बौने लगते हैं दुनिया के सारे आडंम्बर।
ये मतभेद, ये ईर्ष्या और ये संकीर्ण दीवारें,
सब टूट के गिर जाती हैं गहरी खाईयों के अंदर।

खुद की ही नजरों में इतना ऊपर उठ जाना है,
इन तुच्छ टीलों को बस मिट्टी का ढेर बनाना है।
जहाँ रोज की छोटी बातें मन को आहत करती थीं,
अब उन रास्तों पर केवल मुस्कुराते जाना है।

मन शांत रहे, पर सोच हिमालय जैसी हो,
इस मतलबी जहाँ में पहचान तुम्हारी ऐसी हो।
तूफान भी आएँ तो केवल लहरों की तरह गुजरें,
पर तेरी आत्म-शक्ति की नींव कभी न डिगी हो।

उठो कि तुम्हारी खामोशी भी एक पैगाम बने,
हर गिरते हुए इंसान के लिए एक सहारा, एक नाम बने।
जब छुओगे तुम इंसानियत का वो सवोंच्च शिखर,
तब जाकर तुम्हारा यह जीवन सच में
मुक्कमल और महान बने।

-: सार्थक पियुष सिंह
4 घंटे पहले
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