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सच्चा बोलने वाले अंदर ही अंदर जलते हैं।

Sarthak Piyush

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच्चाई की राहों पर जो चलते हैं,
        
                                                    
                            
वे पग-पग पर अक्सर गिरते-संभलते हैं।
दुनिया की इस भीड़ में वो तन्हा दिखते,
सच्चा बोलने वाले अंदर ही अंदर जलते हैं।

मन में विश्वास लिए वो सच को अपनाते हैं,
पर गैरों क्या, अपनों से भी ठोकर खाते हैं।
अपनी पावन बातों को वो समझा न पाते,
बस खामोशी के आंसू चुपके से बहाते हैं।

क्या सच का दामन थामना आज गुनाह हुआ?
क्यों हर सच्चा इंसान यहाँ बेपनाह हुआ?
झूठ के ऊंचे महलों को हंसते देखा है,
और सच्चाई का आशियाना क्यों तबाह हुआ?

झूठे लोग यहाँ महफिल में मुस्कुराते हैं,
मक्कारी के ताने-बाने रोज बुनते हैं।
दिखावे की खुशियों में वो डूबे रहते हैं,
दुनिया वाले भी बस उनकी ही सुनते हैं।

पर सोचो क्या वो खुशियाँ सच में सच्ची हैं?
या रेत पर बनी हुई दीवारें कच्ची हैं?
बाहर का ये वैभव तो बस एक छलावा है,
अंदर से उनकी आत्मा कितनी जख्मी है।

सच्चे इंसान को भले ही कष्ट अपार मिले,
अपमान, उपेक्षा और दुखों का संसार मिले।
पर उसका मन गंगा सा निर्मल रहता है,
चाहे उसे जमाने से बस तकरार मिले।

झूठ की उम्र तो बस चंद दिनों की होती है,
सच्चाई की चमक हमेशा अमर ज्योति है।
कष्टों की भट्टी में तपकर जो निखरता है,
वही इंसान जमाने में सच्चा मोती है।

हार मत मानो तुम इस मुश्किल घड़ी में,
ताकत बहुत बड़ी है सच्चाई की लड़ी में।
अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होगी,
यही लिखा है इतिहास की हर एक कड़ी में।
-सार्थक पियुष सिंह
एक महीने पहले
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