जस जस कलयुग चढ़त प्रभाव, धर्म संस्कृति की होही अभिमान।
अधर्मी रुप बदलते अनेक, ज्यों ज्यों धर्म का रुप होत सम्मान।।
बाहर-बाहर आडंबर है, भीतर खाली ठांव है,
कवि 'सुरेश' देखे दुनिया को, कलयुग का यह प्रभाव है।
पूजा-पाठ, धरम-करम बस, बन बैठे हैं अब व्यापार,
संस्कृति का बस ढोंग रचाकर, मानव करता यहाँ अहंकार।
बदल रहे अधर्मी चोले, पग-पग पर छल-कपट अपार,
साधु भेष में घूम रहे हैं, देखो कितने यहाँ सियार।
सच्ची बातें चुभती सबको, झूठ का होता जय-जयकार,
पर 'सुरेश' मन हिम्मत रखना, बदलेगा ये भी संसार।
मर्यादा की कसम उठाके, लोग यहाँ मर्यादा खोते,
बोकर बीज बबूल के जग में, आम फसल की चाहत रखते।
रिश्ते-नाते और सगे सब, स्वार्थ की भेंट चढ़े जाते हैं,
कलयुग के इस विखरे दौर में, अपने ही विष घोल रहे हैं।
धरम-ग्रंथ की बातें केवल, जीभ पर आके ठहर गई हैं,
सत्य, दया और पावन करुणा, जैसे मन से उतर गई हैं।
धन-दौलत के मद में अंधा, इंसान यहाँ बौराया फिरता,
परछाईं भी साथ न देगी, यह शाश्वत सच भूल है जाता।
गिरगिट जैसे रंग बदलता, अधर्मी का हर एक ठिकाना,
कभी सत्य का चोला पहने, कभी सीखे धरम सिखाना।
पर 'सुरेश' मन विचलित न हो, यह तमस बहुत दिन टिक न पाएगा,
जब-जब पाप का घड़ा भरेगा, काल स्वयं ही न्याय चुकाएगा।
मंदिर-मस्जिद, तीर्थ-तीरथ, भटक रहा मानव अज्ञान में,
असली ईश्वर रो रहा बाहर, भूखा-प्यासा इस जहान में।
मानवता की सेवा ही बस, सबसे बड़ा अनुष्ठान यहाँ है,
जो समझे इस मर्म को दिल से, ईश्वर का वास वहाँ है।
अंधियारा चाहे जितना फैले, भोर किरण आ ही जाती है,
लाख बदल ले रूप अधरमी, सच की मूरत निखर ही जाती है।
मान घटेगा झूठे जग का, मिट जाएगा सब अभिमान,
समय थपेड़े जब मारेंगे, तब होगा असली धर्म का सम्मान।
कवि 'सुरेश' की वाणी कहती, मन में सच्चा धीर धरो,
बाहरी भेष को छोड़ो प्यारे, अंतस में तुम शुद्ध बनो।
अंतिम जीत उसी की होगी, जिसका निर्मल और सच्चा ज्ञान,
कलयुग के इस दौर में भी, चमकेगा पावन धर्म-विमान।