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" अंतस का आधार : परिवार"

सुरेश पटेल

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            संस्कृति का प्राण है, सभ्यता की शान है,
        
                                                    
                            
हर धड़कते हृदय में बसता यही सम्मान है।
प्यार, त्याग, विश्वास की यह पावन अमर दीवार है,
ईंट-पत्थर का नहीं, परिवार ही संसार है॥

जहाँ दुआएँ दीप बन हर राह को उजियार दें,
जहाँ थके पग प्रेम पाकर फिर नई रफ्तार लें।
स्वर्ग यदि धरती कहीं है, तो यही वह द्वार है,
ईंट-पत्थर का नहीं, परिवार ही संसार है॥

शीश पर जिसके सदा आशीष का आकाश है,
उस पिता के त्याग से ही घर का हर उल्लास है।
धूप अपने भाग की लेकर हमें छाया मिली,
उनकी टूटी नींद से ही स्वप्न की माया मिली।

पाँव में छाले पड़े, पर मुस्कुराकर चल दिए,
स्वार्थ के सब द्वार बंद कर, धर्म के पथ ढल दिए।
वह नहीं केवल जनक, जीवन का उद्घोष है,
पिता स्वयं परिवार का अडिग हिमालय-कोष है॥

जिसके आँचल की हवा हर पीर को सहला गई,
सूनी आँखों में भी आशा की किरण झलका गई।
भूख अपनी भूलकर जिसने हमें भोजन दिया,
दर्द पीकर भी सदा मुस्कान का दर्पण दिया।

माँ स्वयं भगवान का धरती पर अवतार है,
हर दुआ के बीच उसका ही छिपा आकार है।
मंदिरों में देव मिलें या न मिलें संसार में,
माँ मिले तो स्वर्ग उतर आता है परिवार में॥


अंतरा – ३ : भाई–बहन — स्नेह का बंधन

राखियों के एक धागे में जहाँ संसार है,
भाई-बहनों का वही अनुपम अमर व्यवहार है।
नोक-झोंकों में छिपा अपनत्व का संगीत है,
दूर रहकर भी धड़कता एक ही मनमीत है।

गिर पड़े जब भी कदम, पहला सहारा बन गए,
आँसुओं के बीच भी हँसने का इशारा बन गए।
रक्त का रिश्ता नहीं, विश्वास का विस्तार हैं,
भाई-बहनों से ही महके घर-आँगन, परिवार हैं॥


अंतरा – ४ : दादा-दादी — संस्कारों की छाँव

दादी की हर एक कथा में धर्म का उपदेश था,
दादा की हर सीख में जीवन का संदेश था।
उनके अनुभव से सजे हर पीढ़ियों के पाँव हैं,
वृद्ध केवल देह से हैं, ज्ञान के वे गाँव हैं।

जिनके चरणों की धूल ही भाग्य का श्रृंगार है,
उनके बिना सूना लगे उत्सव और त्योहार है।
जो बड़ों का मान रखे, वह घर सदा धनवान है,
संस्कारों का अमर मंदिर वही परिवार है॥


अंतरा – ५ : पत्नी — जीवन की सहयात्री

त्यागकर अपना जहाँ, जो साथ मेरे आ गई,
मेरे हर संघर्ष में वह दीप बन मुस्का गई।
जब समय प्रतिकूल था, वह ढाल बनकर साथ थी,
हार की हर रात में, वह जीत की ही बात थी।

अर्धांगिनी केवल नहीं, जीवन की पहचान है,
मेरी हर उपलब्धि का आधा उसी को मान है।
विश्वासों की नींव पर जिसने महल तैयार किया,
पत्नी ने ही प्रेम से हर दुःख को उत्सव कर दिया॥

बेटियाँ आँगन में जैसे चाँदनी की छाँव हों,
बेटे जैसे वृक्ष बन हर आँधियों की बाँह हों।
दोनों ही ईश्वर प्रदत्त जीवन का वरदान हैं,
इनसे ही तो पूर्ण होते घर, धरा, इंसान हैं।

इनको केवल धन नहीं, संस्कार का उपहार दो,
सत्य, सेवा, प्रेम की अमूल्य धरोहर धार दो।
कल इन्हीं के हाथ में परिवार का आधार है,
इनसे ही मुस्काएगा भारत और संसार है॥

अंतरा – ७ : आधुनिक विडम्बना

आज रिश्ते बिक रहे हैं स्वार्थ के बाजार में,
माँ-बाप भी छूट जाते वृद्धाश्रम की हार में।
मोबाइलों की रोशनी ने मन अँधेरा कर दिया,
पास रहकर भी सभी ने दूरियाँ घर भर दिया।

धन मिला, वैभव मिला, पर चैन का अधिकार खोया,
जिसने परिवार खो दिया, उसने सब संसार खोया।
आओ फिर विश्वास की ज्योति घर-घर वार दें,
टूटते इन बंधनों को प्रेम से आकार दें॥


:-समापन

बंधे हैं जब तक ये रिश्ते, तब तलक संसार है,
इनके बिना स्वर्ग भी केवल विराना द्वार है।
प्रेम, सेवा, त्याग ही परिवार का आधार हैं,
युग बदल जाएँ मगर ये सत्य शाश्वत सार हैं।

"सुरेश" कहे—
धन, महल, दौलत सभी इक दिन यहीं रह जाएँगे,
साथ केवल नेह के निर्मल सुमन ही जाएँगे।
जो परिवारों को बचाए, वही सच्चा वीर है,
रिश्तों की रक्षा जहाँ हो, वहीं बसता धीर है॥

 
3 महीने पहले
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