विज्ञापन

कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ

Santosh Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ
        
                                                    
                            


अपने ही संगम के पथ पर
मनुष्यों की घृणित हरकत पर,
दर्द बयां करती चलतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।

वृक्षों से, पुष्पों से, साथ खड़े भूधर से
पंछी से, बागों से, लहराती बेलों से,
झरनों के कानों को भरती हुई गुजरतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।

राह में अपनी हो के अग्रसर
बेपरवाह लोगों से मिलकर,
ज़रा मायूस सी लगतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।

फिर करतीं विचार उनके कल पर
जो करते नहीं करुणा हम पर,
हरपल सोच में डूबी रहतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।

चुभते हुए पत्थरों से होकर
निरन्तरता को ज़हन में रखकर,
फिर छूतीं अपनी मंज़िल नदियाँ,
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।



- सन्तोष यादव


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12492 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10362 कविताएं

View Profile