कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ
अपने ही संगम के पथ पर
मनुष्यों की घृणित हरकत पर,
दर्द बयां करती चलतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।
वृक्षों से, पुष्पों से, साथ खड़े भूधर से
पंछी से, बागों से, लहराती बेलों से,
झरनों के कानों को भरती हुई गुजरतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।
राह में अपनी हो के अग्रसर
बेपरवाह लोगों से मिलकर,
ज़रा मायूस सी लगतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।
फिर करतीं विचार उनके कल पर
जो करते नहीं करुणा हम पर,
हरपल सोच में डूबी रहतीं नदियाँ
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।
चुभते हुए पत्थरों से होकर
निरन्तरता को ज़हन में रखकर,
फिर छूतीं अपनी मंज़िल नदियाँ,
कुछ कुछ हमसे कहतीं नदियाँ ।
- सन्तोष यादव
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