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कढ़ाई

santosh DRDO

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समुंदर की लहरों को देखता हूं
        
                                                    
                            
तो लगता है,
बड़ी सी कढ़ाई में तेल उबल रहा है
बहुत डर लगता है यहां आकर मुझे
पता नहीं कैसे ?
उंगलियों में चम्मच, हथेली में कढ़ाई
दांतों के बीच इज़्ज़त को दबाए
वो अपना आंचल संभाल रही है।
मेरे घर में भी एक कढ़ाई थी
मां उसमें पूरी छानती
दूर से ही मना करती और
पास आने पर फटकारती
मैं बहुत छोटा था
मगर इतना पता था कि
कढ़ाई में खौफ उबलता है
मुझे सबसे ज्यादा डर
समुंदर से लगता है।

एक औरत यहां,
मेरी आंखों के सामने डूब गयी थी
भागते हुए आयी, रो रही थी
पतली सी थी और
लहरों पर तैर रही थी
बाद में देखा तो
मरकर फूल गयी थी 
मेरा डर इसीलिये नहीं है कि
उसके हाथ में एक बच्चा भी था
मैं इसलिए भी नहीं डरता कि
समुंदर में तूफान आते हैं
मुझे समुंदर से इसलिए डर लगता है क्योंकि
वह औरत जो 
अपने घर से हाथों में लाल चूड़ियां और
नई साड़ी पहनकर आई थी
अंधेरे कमरे में
सन्नाटे को चीरती चीख और
सहलाती नरम हथेलियां
बच्चे को दूध पिला रही है
वह औरत,
सुबह से शाम होने तक
बुझे चूल्हे को जलाने के लिये
ताउम्र आग के मुहाने पर बैठी रही और
कढ़ाई में उबलते तेल को देखकर
उंगलियों के इशारे से
मरते दम तक
गोद में बैठे बच्चे को बताती रही कि
"समुंदर में देवता रहते है "
- संतोष यदुवंशी

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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