जम्हूरियत
कुछ तुम सोचो
कुछ हम....
क्योंकि तुम्हारे अकेले सोचने से
कुछ नहीं होता ,
मुल्क अपने पैरों पर खड़ा है
अंगूठे पर नहीं....
बस एक तुम हो जो अंगूठा गिन रहे हो
पक्ष और विपक्ष में |
माना...माना...माना......
कि मुल्क मेरा मुंतशिर है अभी
मगर जम्हूरियत कभी मुसलमान नहीं होती
हिन्दू भी नहीं होती, सिख और जैन भी नही
हमने तुम्हें वोट दिया था, अपना दिमाग नहीं
लेकिन तुम हो की हमें शगूफा समझते हो
कैसे नादान हो ?
जो जम्हूरियत को अंगूठा समझते हो |
कुछ तुम सोचो , कुछ हम
अकेले कुछ भी नहीं होता
खुद-ब-खुद....
हम सड़क पर खड़े होकर सोच रहे हैं
तुम सदन में बैठकर सोचो ,
जो सरहद के किनारे है वो भी तो सोचेंगे
कुछ ना कुछ.....
वरना पूरी दुनिया हम पर थूकेगी ? की
चरवाहों के देश में एक रोज
हर्ष फायरिंग हुई , और
खूंटे से बंधी गाय मर गई
लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया
क्योकि मारने वाले के पास बंदूक थी और
माहौल जश्न का था | |
"संतोष यदुवंशी "
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