विज्ञापन

इंसानियत

sanserpal singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इंसानियत मर गई इंसान की,
        
                                                    
                            
दिलों में, अब प्रेम कहाँ बाकी रहा।
जैसे मझधार में डूबती हो कोई कश्ती,
उसे बचाने वाला कोई न रहा।
चारों ओर भीड़ तो बहुत है मगर,
दर्द बाँटने वाला कोई न रहा।
रिश्ते अब स्वार्थ की डोर से बंध गए,
अपनापन जैसे कहीं खो गया।
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all