हुस्न की अदाओं को,
हम इश्क़ अपना समझ बैठे।
जो थी उनकी अदावत,
उसको हम इश्क़ समझ बैठे।
हम चाहत को अपना इश्क़,
उनके फ़रेब को इश्क़ समझ बैठे।
देखा जो हमें, वो मुस्कुरा दिए,
हम उसे इज़हार-ए-इश्क़ समझ बैठे।
वो ख़ामोश रहे तो लगा,
शायद दिल में राज़ समझ बैठे।
वो दूर जाते रहे हमसे,
हम उसे भी मोहब्बत का अंदाज़ समझ बैठे।
वो हर बार वादे तोड़ते रहे,
हम हर बार ख़ुद को नासमझ समझ बैठे।
उनकी हर एक चोट को भी,
हम इश्क़ का इम्तिहान समझ बैठे।
आख़िर पर्दा उठा जब फ़रेब से उनके,
हम ख़ुद को ही गुनहगार समझ बैठे।
जिसे समझा था हमने अपना इश्क़,
उसे वो बस एक खेल समझ बैठे।
-संजीव शर्मा ज़ख़्मी