आज प्रयासों में यदि तुमनें ढील छोड़ दी
जिम्मेंदारी को समझनें वाली फील छोड़ दी
फिर जो चाहते नहीं हो , वह भी करना पड़ेगा
जिंदा रहनें के निमित्त रोज मरना पड़ेगा
घूम फिर के अंत में फिर तुम भी वहीं आओगे
चुनौतियों के बीच असहाय खुद को पाओगे
घिसा पिटा राग वही तुम भी दोहराओगे
घर की और समाज की फिर कमियाँ गिनाओगे
तो कह रहा हूँ बात जो ये पल्ले गाँठ बाँध लो
रुकावटें जो राह की सभी को फाँद- लाँघ लो
ये जिन्दगी है जिन्दगी कोई सेज नहीं फूल की
मानों भूमि युद्ध की, गुंजाइश नहीं भूल की
व्यर्थ के प्रलाप सब उठा कर रख दो ताख पर
किसी भी हाल टूटे ना विश्वास स्वयं आप पर
तर्क पूर्ण कर्म का ही तंत्र- मंत्र -जाप हो
निर्माता अपनी जिंदगी के तुम स्वयं आप हो