काट हमारा रैन बसेरा,
नर ने अपना विस्तार किया।
हमें बनाकर बेघर उसने,
हम पर कैसा एहसान किया?
मैं देखूं जग वाले कैसे,
कितने पाप करते करेंगे और?
नहीं रहेंगे पशु पक्षी तो,
कैसे लगेगा उनका ठौर?
–संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’