गुरु कुम्भार
गढ़ि घट सुघर
चोट लगाय।
पुत्र उभय
क्या किये कुरु में?
कह संजय।
धर्म घटत
जब पाप बढ़त
रूप रचत।
साधु रक्षाय
व पाप विनाशाय
प्रकट युगे।
हानि करे न
वायु, नीर, शस्त्राग
मरे न आत्मा।
हुआ न काल
न थे–हम, तुम, ये
न आगे होगा।
– संजय कुमार गुप्त ‘अबोध’