कुँवर मत सोने दो जज्बे को, उसको हुंकार लगाने दो
जो भरी हुई ऊर्जा उसमें, उसको बाहर आ जाने दो
मत होने दो अब शांत उसे, उसमें उबाल आ जाने दो
मत डरने दो किसी बाधा से, हर बाधा तोड़ कर जाने दो
डरने रुकने या थकने का, इरादा मत उसमें आने दो
वह मिलना चाहे क्षितिज से गर, बेसक उसको मिल जाने दो
नहीं खास कुछ और कहीं, सारा उबाल शोणित का है
बाकी सारे तो बहाने हैं, उसमें कुछ नहीं गणित का है
खूँ में उबाल आ जाने से, मस्तक-विवेक जग जाता है
मन के भीतर जो ठान लिया,वह सदा उसी पथ जाता है
रोकेगा कौन कुँवर उसको, रण में जो खुदको डटा दिया
अपने मन के संशय को, हर रूप में जिसने मिटा दिया
बेखौफ ही बढ़ जाता है वह, अपनी मंजिल पा जाने को
मरने मिटने का शोक नहीं, बस जीत के लिए जिंदा जो
कौन आंख उठायेगा उस पर, उड़ता जांबाज परिंदा जो
तैयार शिकार के लिए कभी, जब शेर खड़ा गुर्राता है
जंगल का कोई जीव कहाँ, उसके सामने तब आता है
तुम भी ऐसे ही शेर बनो, शोणित में अपने उबाल रखो
अपने दहाड़ की गर्जन से, हर दुश्मन का बुरा हाल रखो
केवी के चेतक पर चढ़कर, तुम्हें दुनिया जीत के आना है
हर मौका दे रहा है केवी, नहीं करना कोई बहाना है
हो जाए तुम्हारी झलक ऐसी, जहां रहो केवी की शान दिखे
सच कर दो कुंवर की आशा को, केवी का इतना सम्मान दिखे
-कुँवर संदीप सिंह