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काया के भूख की

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काया के भूख की काया के प्यास की
        
                                                    
                            
दीवानगी हो जिसमें अपने ही रास की
हो वह भी इतनी की अपनों को छोड़ दे
गहरे नाते रिश्तों को बाहों में तोड़ दे
चमकें आँखें होठ पर मुस्कान तब भी हो
किसी को न नसीब ऐसी दुकान कभी हो
-कुँवर संदीप सिंह
एक महीने पहले
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