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हिन्दी दिवस: बस-बस-बस!

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हिन्दी दिवस: बस-बस-बस!
        
                                                    
                            
बहुत हो चुका बस-बस, और नहीं अब हिन्दी दिवस
घर को ही घर वाला तरसे, मुस्काँ की जगह आँसू बरसे
घर वाला इसको सहे कैसे, जाने दे इसको बहे कैसे
अपने ही राष्ट्र के भाषा की, धुंधली होती परिभाषा की
है तो विरोधाभास बहुत, होता क्यों नहीं आभास बहुत
बाहरवाली इसे दबाती है, कैसी बन रही परिपाटी है
मानस दिवालियापन जिसको, मानते दीवानापन इसको
अपनों को छोड़ है सुख कैसा, गैरों संग सुख है भ्रम जैसा
भ्रम कहाँ साथ निभाता है, आगे गायब हो जाता है
भ्रम के साथ न और जियो, हिन्दी की रसना को पियो
हिन्दी का ही बोलबाला हो, अपने भाषा की माला हो
मोल अधिकतम अपनों को, पूरा करता है सपनों को
भाषा अपनी साँचा अपना, आशा अपनी तराशा अपना
नए और पुराने सब हिन्दी, चमके ज्यों मोती की बिंदी
हर ओर हो जाए व्याप्त यही, सबको लगे पर्याप्त यही
मिल जाने दो भाषा को यश, बरसे हिन्दी पूरे ही बरस
बहुत हो चुका बस-बस !, और नहीं अब हिन्दी दिवस
-संदीप सिंह कुँवर
एक महीने पहले
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