पल में धुल जाता है
जमीर आज-कल
बनाने के लिए अपनी
तकदीर आज-कल
लड़ अपनों से जिसको
बनाते हैं अपना
छोड़ते हैं उसे ऐसे ज्यों
सच न हो हो सपना
गैरों में सिमट होंठ पर
जगाते हैं मुस्कान
कैसे कैसे कुदरत तुमने
रचा है ये जहान
-कुँवर संदीप सिंह