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बदलने की आजादी

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं सीख सका है बदलना जो
        
                                                    
                            
जमाना उसको दबा देता है
जो रुख हवा की पहचाने
ज़माना उसको हवा देता है
दृढ़ रहो अपनी तमन्ना पर
बदलो जब राह जरूरी हो
यह हालातो की मांग बने
या करना इसे मजबूरी हो
सिर्फ नाम की आजादी कैसी
नियति बन जाए गुलामी जहां
नजरे ना डाल सको उस पर
दिल की धड़कन बसती हो जहां
जागो और नजरें खोलो अब
खूंखार बनो और बोलो अब
जिसे लक्ष्य बनाकर साधा है
पूरा मेरा नहीं आधा है
ऐसे ही नहीं हो पहुंचे तुम
इस केवी की गलियारे में
है बहुतायत सब फंसे हुए
शिक्षा जग के अंधियारे में
केवी तुम्हें मुक्त कर रहा है
शिक्षा देकर हर मुश्किल से
है खेल तुम्हारे हाथ में अब
पढ़ लो लिख लो सच में दिल से
आजादी मिले तुम्हें चिंता से
आशंका से किसी भी डर से
आजादी की हो गूंज कुंवर
भारत के हर एक घर-घर से
-कुँवर संदीप सिंह
2 महीने पहले
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