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बदलने की आजादी

                
                                                         
                            नहीं सीख सका है बदलना जो
                                                                 
                            
जमाना उसको दबा देता है
जो रुख हवा की पहचाने
ज़माना उसको हवा देता है
दृढ़ रहो अपनी तमन्ना पर
बदलो जब राह जरूरी हो
यह हालातो की मांग बने
या करना इसे मजबूरी हो
सिर्फ नाम की आजादी कैसी
नियति बन जाए गुलामी जहां
नजरे ना डाल सको उस पर
दिल की धड़कन बसती हो जहां
जागो और नजरें खोलो अब
खूंखार बनो और बोलो अब
जिसे लक्ष्य बनाकर साधा है
पूरा मेरा नहीं आधा है
ऐसे ही नहीं हो पहुंचे तुम
इस केवी की गलियारे में
है बहुतायत सब फंसे हुए
शिक्षा जग के अंधियारे में
केवी तुम्हें मुक्त कर रहा है
शिक्षा देकर हर मुश्किल से
है खेल तुम्हारे हाथ में अब
पढ़ लो लिख लो सच में दिल से
आजादी मिले तुम्हें चिंता से
आशंका से किसी भी डर से
आजादी की हो गूंज कुंवर
भारत के हर एक घर-घर से
-कुँवर संदीप सिंह
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5 घंटे पहले

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