विज्ञापन

आल्हा-उदल

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आल्हा उदल जहां पहुँचि गए
        
                                                    
                            
तहाँ और केहु टिकि न पाय
जौने ओर चला जाय घोड़ा
भर मैदान साफ होइ जाय
लइ तलवारि पाकर मुठिया में
चम-चम चम-चम चमके जाय
जेहि भिड़ा आल्हा उदल से
भरि-भरि मुंह से माटी खाय
सुनेह नाम आल्हा उदल कै
हर दुश्मन जाता थर्राय
काव बताई काव सुनाई
कहां वीरता अब उ बाय
अब तो बस छीना झपटी है
मर्दानगी तो गई ओराय
-कुँवर
एक दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Sarthak Piyush

33 कविताएं

View Profile