तुम हो,
कड़कड़ाती सर्दी में
दिल को राहत देती
चमकती हुई धूप-सी।
तुम हो…
बारिश की पहली फुहार,
जिससे झूम जाए मन
और दिल को ठंडक मिल जाए।
तुम हो…
गर्म दोपहर में
पेड़ की छाँव जैसे,
थके हुए मन को
सुकून दे जाए।
तुम हो…
सुबह की पहली किरण,
जो अँधेरे कमरे में
धीरे से उतरकर
उम्मीद जगा जाए।
तुम हो…
शाम की वह ख़ामोशी,
जिसमें बैठकर
बिना कुछ कहे भी
बहुत कुछ कहा जाए।
तुम हो…
यादों में खोई
एक धुँधली तस्वीर-सी,
जिसे देखते ही
दिल ठहर-सा जाए।
तुम हो…
मेरी हर कविता की पंक्ति
और हर वह शब्द,
जिसे पढ़ते ही
बार-बार पढ़ने को जी चाहे।
तुम हो…
मेरी चाहत, मेरा सुकून,
वह ख़ूबसूरत एहसास
जिसे बस दिल के कमरे में
प्यार से महसूस किया जाए।