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राहों में।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कैसे कैसे लोग मिले हैं राहों में।।
        
                                                    
                            
कच्चे पक्के दाग़ मिले हैं राहों में।।

तेरे भी क्या ऐब गिनाएंगे अब हम,,
हम भी तो बेबात मिले हैं राहों में।।

ज़िंदगी क्या चार दिनों का मेला है,,
चलते फिरते रोग लगे हैं राहों में।।

अपनी दुनियां तो चाहत दूर रही,,
करते करते बोझ लगे हैं राहों में।।

मंज़िल की चाहत में सारे छूट गए,,
पाँव के बस छाले बढ़े है राहों में।।

हमसे निस्बत होती तो मिल जाते,,
हम तो उनको रोज़ मिले हैं राहों में।।

शाम हुई चल घर चलते हैं अब देव,,
ग़म ही ग़म के साज़ मिले हैं राहों में।।
-सुनील देव
3 महीने पहले
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