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लोग घरों में रहते हैं।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़े उदास नज़र आते हैं जो लोग घरों में रहते हैं।।
        
                                                    
                            
कल परसों जो पैदा हुए वो लोग सरों पे रहते है।।
छोटे बड़े की लाज़ रही ना आंखों में ही शर्म हया,,
बूढ़ी आँखें झुक जाए हैं नए लोग बड़ों से कहते हैं।
किस किसको समझाएं अब सब ही तो इक जैसे हैं
ऐंठ सभी में इक जैसी है बे-जोड़ जड़ों में रहते है।।
गुस्ताख़ी का आलम ऐसा कहें किसी से भी तो क्या,
घर घर की है यही कहानी नए रोग धड़ों में रहते है।
जेब में फूटी कौड़ी नहीं और आलम देखो शाहों सा,,
छूने को दिल सूरज का और शौक़ घड़ों में रहते है।
रंज़िश का माहौल बनाकर रखा है यहाँ हर घर में,
ना डरते ना शर्माते है बस खड़े रोज़ सरों पे रहते हैं।।
रुतबे को तो भूल जाओ देव वो दिन तो आने से रहे,,
अब तो ये आलम हर घर का लोग डरो में रहते है।।
-सुनील देव
4 घंटे पहले
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