किसी के घर की इज़्ज़त आँख की पुतली रही होगी।।
ये जो अब लाचार दिखती है कभी लड़की रही होगी।।
कभी ये भी किसी की ज़िंदगी की नूर ए नज़र होगी,,
किसी दरिया समंदर में ये मनचली मछली रही होगी।।
क्या हर वक़्त इशारों ही इशारे में कमियां गिनाते हो,,
इस वीरा पड़े खंडहर में भी कभी खिड़की रही होगी।।
लिखते रहते हो जिन दीवारों पर बड़ी बात तुम यारों,,
इन्हीं दीवारों के पीछे अबला कभी कोई जली होगी।
ज़माने भर में क्यूँ कोई इनके लिए आगे नहीं आता,,
कभी तो इनके हिस्से भी यहाँ कोई अँगुली रही होगी
किसी ने सच कहा है जब तलक काँधे है जी लो तुम,,
उठा जो बाप का साया तो उस दिन संदली नहीं होगी।।
निशाना साध लो जितना भी तुम पर साधा जाए देव,,
तुम भी देख लेना एक दिन ये पुस्ते नस्ली नहीं होगी।।
-सुनील देव